जिस वंश से मैं हूँ आईये उसके वटवृक्ष से आपका परिचय करवाऊं। हो सकता है अलग हुईं और भी शाखाएं यहाँ फिर जुडें।
जिस वंश का यहाँ ज़िक्र होगा वह है "मिश्र " वंश। मान्झगांव ,भगवंतनगर के देवमणि शाखा के मिश्र ।
देवमणि ऑक के माँझगाँव के मिश्रों को भगवंतनगर में 'महलहा'कहा जाता रहा है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है इस वर्ग के वहां रहने वाले सभी व्यक्तियों के मकान आपस में जुड़े हुए, दो मंजिलें,लखौरी,या ककैया इंटों से बने,चूने के प्लास्टर से युक्त,एक विशाल एवं भव्य महल से ही दिखते रहे हैं।
इस वंशवली को हम संक्षिप्त रूप में देखते हुए चलते हैं एक के बाद एक। यहाँ हमने अपने वृक्ष को देखना शुरू करेंगें देवमणि से ही :
यहाँ मात्र उस शाखा को लिया गया है जो हमारे परिवार तक पहुँचती है ..पं . नवल किशोर मिश्र,भगवंतनगर ।
- देवमणि -.केशवराय ,जटाशंकर ।
- केशवराय -शिवगोविन्द, मोतीलाल ,जागेश्वर,.शम्भुनाथ।
- जटाशंकर - देवदत्त ।
- देवदत्त - रामकृष्ण, सुखनंदन ।
- सुखनंदन - शिवप्रसाद ,गजाधर ,सदानंद ।
- सदानंद -सांवले कृष्ण ,क्षेमराज ।
- सांवले कृष्ण - मुखलाल,ब्रह्मानंद, सिद्धिनाथ ,ठाकुरप्रसाद , बालगोविन्द ,कुञ्ज बिहारी।
- कुंजबिहारी - मुरलीधर।
- मुरलीधर - नंदकिशोर, बांकेबिहारी, बनवारीलाल।
- नंदकिशोर - लालबिहारी ,युगलकिशोर, रसिकबिहारी ।
- लालबिहारी -मदनमोहन,.बृजमोहन ,जगमोहन।
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